Meerabai ke kavya mein prem-darshan ki avdharna: Adhyatmik samarpan, atmnirnay aur samkalin prasangikta ka adhyayan
Abstract
यह शोधपत्र मीराबाई के काव्य में निहित प्रेम-दर्शन की अवधारणा का विश्लेषण करते हुए उसके आध्यात्मिक, दार्शनिक, सामाजिक तथा समकालीन आयामों का अध्ययन प्रस्तुत करता है। मीराबाई ने प्रेम को केवल भावनात्मक अनुभूति या लौकिक संबंध के रूप में नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मध्य स्थापित दिव्य एवं शाश्वत संबंध के रूप में अभिव्यक्त किया है। उनके काव्य में कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह, आत्मसमर्पण तथा आध्यात्मिक एकत्व की भावना प्रमुख रूप से परिलक्षित होती है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि मीराबाई का प्रेम-दर्शन भक्ति को कर्मकांडों से मुक्त कर आत्मिक अनुभव और ईश्वर-प्राप्ति का सहज मार्ग बनाता है। उनके काव्य में प्रेम और भक्ति के साथ आत्मनिर्णय की चेतना भी विद्यमान है, जिसके माध्यम से उन्होंने तत्कालीन सामाजिक रूढ़ियों, पितृसत्तात्मक मान्यताओं तथा स्त्री-असमानता को चुनौती दी। इस दृष्टि से उनका व्यक्तित्व स्त्री-अस्मिता, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का सशक्त प्रतीक बनकर उभरता है। शोध में आत्मा-परमात्मा संबंध की दार्शनिक संरचना, माधुर्य-भाव, विरह-अनुभूति तथा पूर्ण समर्पण की अवधारणाओं का विश्लेषण किया गया है। साथ ही आधुनिक संदर्भ में मीराबाई के प्रेम-दर्शन की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि उनका चिंतन आज भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्त्री-सशक्तिकरण, सामाजिक समरसता, नैतिक मूल्यों, मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक संतुलन के लिए प्रेरणास्रोत है। निष्कर्षतः मीराबाई का प्रेम-दर्शन भारतीय भक्ति परंपरा की अमूल्य धरोहर होने के साथ-साथ सार्वकालिक मानवीय मूल्यों, आध्यात्मिक चेतना और मानव गरिमा का सशक्त संवाहक है।