Go Back Research Article August, 2026
INTERNATIONAL MULTIDISCIPLINARY RESEARCH JOURNAL REVIEWS (IMRJR)

MEERA EK DIVYA CHARITRA ; VIRAH EVAM DASATV BHAV KA SAHITYIK ADHYAYAN

Abstract

भक्तिकाल में मीराबाई एक दिव्य चरित्र की महान संत एवं कवयित्री है और उनके जीवन में गिरधर गोपाल के प्रति उनका विरह एवं दासत्व भाव उनके पदों द्वारा प्रतीत होता है | प्रस्तुत शोध पत्र द्वारा यह विश्लेषित किया जायेगा की मीराबाई किस प्रकार स्वयं को सांसारिक बन्धनों में न बांधते हुए केवल गिरधर गोपाल के प्रति दासत्व और विरह भाव को चरम सीमा तक ले गईं | बाई सा का गिरधर गोपाल के प्रति आत्मसमर्पण उन्हें एक दिव्य चरित्र के रूप में परिलक्षित करता है एवं सर्व संपन्न कुल में जन्म लेने के पश्चात भी मीरा बाई के भीतर सांसारिक रिश्ते , धन-संपत्ति आदि किसी के प्रति भी कोई लगाव नहीं था वह केवल गिरधर गोपाल के प्रति समर्पित रहीं, देखा जाये तो जीव को भी इस देह को भूल आत्मा का परमात्मा से मिलन करवाने हेतु सांसारिक बन्धनों में स्वयं को इतना लिप्त नहीं करना चाहिए की देह छूटने के विचार से भी मानसिक पीड़ा का आभास हो | बाई सा ने आजीवन अनेको संतो से भेंट की परन्तु कभी न तो किसी संप्रदाय में बंधी और न ही किसी को अपना शिष्य बनाया | उनके अनुसार संसार में कोई भी बंधन चाहे वह संप्रदाय से जुड़ना ही क्यों न हो , बंधन ही है, जो कभी न कभी ईश्वर के प्राप्ति मार्ग में विघ्न ही उत्पन्न करेगा | निष्कर्षतः कहा जा सकता है की दिव्य चरित्र वाली मीरा का विरह एवं दासत्व भाव हिंदी साहित्य जगत में एक अनूठी पहचान बनाई |

Keywords

मीराबाई बाई सा विरह भाव दासत्व भाव गिरधर गोपाल दिव्य चरित्र अलौकिक भौतिकवाद आत्मसमर्पण साहित्यिक अध्ययन |
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Details
Volume 3
Issue 8
Pages 14 TO 18
ISSN 3139-4833
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