Go Back Research Article March, 2026
National Journal of arts, commerce and scientific research review (NJACSRR) ISSN- 2394-4870

मीराबाई का काव्य: स्त्री-अस्मिता, सामाजिक प्रतिरोध और सांस्कृतिक पुनर्पाठ

Abstract

मीराबाई भारतीय भक्ति साहित्य की प्रमुख कवयित्री हैं, जिनका काव्य केवल आध्यात्मिक भक्ति की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि स्त्री-अस्मिता, सामाजिक प्रतिरोध और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का सशक्त दस्तावेज भी है। प्रस्तुत शोध-पत्र में मीराबाई के काव्य का अध्ययन समकालीन नारीवादी दृष्टिकोण के आलोक में किया गया है। शोध में मध्यकालीन भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक संरचना तथा स्त्रियों की सामाजिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि मीराबाई ने अपने जीवन और काव्य के माध्यम से स्त्री की स्वतंत्र पहचान, आत्मनिर्णय और आत्मसम्मान की स्थापना का प्रयास किया। उनके काव्य में निहित आत्मस्वर स्त्री की भावनात्मक, आध्यात्मिक और वैचारिक स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही, उन्होंने जाति, कुल, सामाजिक ऊँच-नीच तथा धार्मिक आडंबरों का विरोध करते हुए प्रेम, समानता, मानवता और समावेशी सांस्कृतिक मूल्यों को प्रतिष्ठित किया। शोध-पत्र में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि मीराबाई की कृष्ण-भक्ति को केवल धार्मिक अनुभव के रूप में नहीं, बल्कि स्त्री की आत्म-अभिव्यक्ति और सामाजिक प्रतिरोध के रूप में भी समझा जाना चाहिए। समकालीन नारीवादी पुनर्पाठ के संदर्भ में मीराबाई का काव्य स्त्री-मुक्ति, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के विमर्शों में आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मीराबाई भारतीय साहित्य में ऐसी प्रगतिशील चेतना की प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने भक्ति को सामाजिक परिवर्तन और स्त्री-स्वतंत्रता के सशक्त माध्यम के रूप में रूपायित किया।

Keywords

मीराबाई भक्ति आंदोलन स्त्री-अस्मिता आत्मस्वर पितृसत्ता सामाजिक प्रतिरोध नारीवादी पुनर्पाठ स्त्री-स्वतंत्रता सांस्कृतिक विमर्श सामाजिक न्याय लैंगिक समानता कृष्ण-भक्ति आत्मनिर्णय सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मानवीय मूल्य।
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Volume 13
Issue 1
Pages 1 to 8
ISSN 2394-4870
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